ज्ञान की दो धाराएँ हैं –
एक जो कि अस्तित्व से, शून्य से, अंदर से बहती है : वह असीम है, आनंद रूप है, शाश्वत है। दूसरी धारा, जो कि गुरु से, शास्त्रों से, समाज से आती है; वह सीमित है, प्रेरणाप्रद है, परिवर्तनीय है, मरणधर्मा है। वह आत्मज्ञान नहीं अपितु ज्ञान की राख मात्र है, केवल प्रारंभ है क्योंकि इन्द्रियों पर आधारित है, वासना ग्रसित है, संकलन मात्र है।
इसलिए भगवान पतंजलि ने वेद , उपनिषद, दर्शन, पुराण सभी शास्त्रों को मन पर आधारित, संग्रहित अर्थात संकलन किया हुआ बाहर से आया हुआ ज्ञान कहा है। वह प्रारंभ है अंतिम नहीं, परिधि है केन्द्र नहीं क्योंकि तुम्हारी सम्पदा तुम्हारे भीतर है, बाहर खोजोगे तो भटकोगे।
शब्दों में ज्ञान कहां, वह तो स्वयं में छिपा है। लेकिन शास्त्रों का ज्ञान भले ही संकलन मात्र हो, वृत्ति मात्र हो फिर भी वे सत्य की ओर इशारा हैं, प्रेरणा का स्रोत्र हैं। आत्मा में एक चिंगारी जगाते हैं। इसी से आत्मबल प्रकट होता है, वैराग्य जगता है, श्रद्धा का प्रादुर्भाव होता है तथा आत्मज्ञान की राह, स्वयं को बदलने की राह प्रशस्त होती है।